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पिता एक बेटी का

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  हंसकर करती है हर बात मुझसे इस तरह के हर बात पर उसकी रा जी हो जाता हूं दुनिया के दिए शेर मगर उसके सामने मदारी का बंदर बन जाता हूं नन्हे कदमों से आती है इस तरह मेरे पास के, अपने सारे गम भूल जाता हूं इस कदर हक जमाती है मुझ पर कि खुद को उसका गुलाम बना पाता हूं  उसकी हंसी से पूरा घर खिल उठता है और उसके रोने से पूरे घर में उठक बैठक सी हो जाती है पर डरता हूं उस दिन के लिए जिस दिन यह बेटियां पराई हो जाती है  कभी उसकी गुड़िया तो कभी उसका घोड़ा बन जाता हूं एक बार हंसते तो अपने सारे गम भूल जाता हूं  पिता हूं पिता एक बेटी का हर पल घबराया सा रहता हूं न जाने कब चली जाएगी पराई होकर  इस डर से बोराया सा रहता हूं।

बेटियां

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घर के गुलशन में कलियां सी होती है बेटियां  पूरे घर में चहकती परिया सी होती है बेटियां  मां की पर‌छाई और बाप की लाडली होती है बेटियां भाई की जान और बहन की सहेली सी होती है बेटियां  जिस दिन यह कली फूल बन खिल जाती है   उस दिन अपनी क्यारी को छोड़ किसी और आंगन को मंहकाने चली जाती है  कैसे अपने आप को किसी और रंगत में ढाल लेती हैं बेटियां   कैसे एक बेपरवाह से अपने आप को जिम्मेदारी में ढाल लेती हैं बेटियां   रोता है एक बाप इसी दिन के लिए बेटी पैदा होने पर आखिर क्यों अचानक से पराई हो जाती हैं बेटियां