पिता एक बेटी का
हंसकर करती है हर बात मुझसे इस तरह के हर बात पर उसकी रा जी हो जाता हूं दुनिया के दिए शेर मगर उसके सामने मदारी का बंदर बन जाता हूं नन्हे कदमों से आती है इस तरह मेरे पास के, अपने सारे गम भूल जाता हूं इस कदर हक जमाती है मुझ पर कि खुद को उसका गुलाम बना पाता हूं उसकी हंसी से पूरा घर खिल उठता है और उसके रोने से पूरे घर में उठक बैठक सी हो जाती है पर डरता हूं उस दिन के लिए जिस दिन यह बेटियां पराई हो जाती है कभी उसकी गुड़िया तो कभी उसका घोड़ा बन जाता हूं एक बार हंसते तो अपने सारे गम भूल जाता हूं पिता हूं पिता एक बेटी का हर पल घबराया सा रहता हूं न जाने कब चली जाएगी पराई होकर इस डर से बोराया सा रहता हूं।